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नौकरशाही में आमूलचूल बदलाव की जरूरत

ब्रेकिंग न्यूज़ यूपी

लेखक – चंद्र भूषण पांडेय

बदलाव प्रकृति का नियम है, व्यक्ति हों या संस्थाएं उन्हें प्रासंगिक बने रहने के लिए, अग्रणी बने रहने के लिए, समीचीन बने रहने के लिए, नवाचारी होना पड़ेगा, समाधान कारी होना पड़ेगा, समय के साथ कदमताल करना पड़ेगा। गतिशीलता और परिवर्तन यह विकास का दो पहिया है जो गतिशील होगा, परिवर्तनशील होगा व प्रकृति के संकेतों को समय पर समझ कर अपने आचार, विचार और कार्य निर्धारित करेगा वही नेतृत्व करेगा, मुख्यधारा में रहेगा और निरंतरता का साक्षी बनेगा।

औपनिवेशिक शासकों द्वारा अपने व्यापारिक और साम्राज्यवादी हितों के लिए बनाई गई इस्पाती ढांचा वाली भारतीय सिविल सेवा को बदलना ही होगा। जब भारत 2022 में अपनी आजादी की 50वीं सालगिरह मना रहा होगा तो हमें देखना होगा कि दुनिया का सबसे विशाल लोकतंत्र है सबसे जीवंत लोकतंत्र अपनी कार्यपालिका को लेकर कहां खड़ा है? राजनीतिक कार्यपालिका जिसे हम सरकार कहते हैं, स्थाई कार्यपालिका यानी नौकरशाहों के माध्यम से नीतिगत निर्णय को जमीन पर उतारने का काम करता है यहां हमें समझना होगा कि यह नीतियां जन भावनाओं के अनुरूप बनती हैं क्योंकि जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि विधायिका में बैठकर नीतियां बनाते हैं और बहुमत वाली संख्या के साथ राजनीतिक कार्यपालिका में बैठकर उन नीतियों के क्रियान्वयन पर नजर रखते हैं। इस सच को नकारा नहीं जा सकता कि हर जनप्रतिनिधि के मन और मस्तिष्क में जनता के सपने होते हैं और सपने के अनुरूप यदि नीतियां बनीं, सरकार चली तो वह भी चलेंगे नहीं तो 5 वर्ष बाद उन्हें अपनी कुर्सी गंवानी पड़ेगी यह एक मूल मंत्र है लोकतंत्र का विशेष रूप से संसदीय लोकतंत्र का।

अखिल भारतीय सेवाओं के स्वरूप को लेकर उनके कार्य व्यवहार को लेकर, उनके आचरण को लेकर बार-बार सवाल उठते रहे, अनेक प्रशासनिक सुधार आयोगों ने अखिल भारतीय सेवाओं में बदलाव को लेकर अलग अलग संस्तुतियां दिया है। कुछ अमल हुआ, कुछ लालफीताशाही की भेंट चढ गया।

21वीं सदी की सिविल सेवा कैसी हो इसको लेकर जनमानस में मतैक्य है, जनता मानती है कि वह संप्रभु है उसके हिसाब से सरकारें चलनी चाहिए, जिसमें जनप्रतिनिधि, राजनीतिक कार्यपालिका और स्थायी कार्यपालिका नौकरशाही को जन भावनाओं को बारीकी से समझते हुए अपने कार्य व्यवहार और आचरण निर्धारित करने चाहिए। नौकरशाही जनोन्मुखी हो, संवेदनशील हो,परिवर्तनशील हो, नवाचारी हो, समाधान कारी और अपने को ईमानदारी से लोक-सेवक समझे ऐसी मन: स्थिति में उसको लाना होगा और इस कार्य को करने के लिए उसकी भर्ती से लेकर प्रशिक्षण व्यवस्था तक निरंतर आमूलचूल बदलाव की जरूरत है।

लोक सेवा की भावना किसी भी व्यक्ति के अंदर आए यह कानून से निर्धारित नहीं किया जा सकता इसके लिए ऐसे व्यक्तियों को भर्ती करना पड़ेगा जो इस सरोकार को, इस संवेदना को व इस सच्चाई को हृदय की गहराइयों से स्वीकार करते हो और उनके अंदर सेवा की भावना, नवाचारी वृत्ति, जनोन्मुखी कार्य व्यवहार की कुशलता व्यवसायिक स्तर की विकसित हो सके इस दृष्टि से प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित करने होंगे और प्रशिक्षण के उपरांत कार्य व्यवहार में कितना उतर पा रहा है इस पर्यर्वेक्षण की भी जरूरत है और तदनुसार प्रशिक्षण मॉड्यूल को समय-समय पर बदलते रहने की भी जरूरत है।

भारत की नौकरशाही औपनिवेशिक विरासत का एक जीवंत सशक्त नमूना है। नौकरशाही शब्द के जन्मदाता जर्मन समाजशास्त्री वेबर को माना जाता है, इनके द्वारा प्रस्तुत आदर्श नौकरशाही की अवधारणा संपूर्ण विश्व में येन केन प्रकारेण मिलती है। सच यह है कि नौकरशाही समय काल परिस्थितियों के हिसाब से बदलती रही है। भारत में नौकरशाही की जड़ें बहुत पुरानी है। मौर्य काल में भी मात्य / अमात्य की भर्ती और शासन-प्रशासन को प्रबंधित करने में उनकी भूमिका की चर्चा आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में किया है। मौर्य काल की नौकरशाही की विरासत इतिहास के पन्नों में कहीं दफन है। आज की नौकरशाही जो हमारे सामने हैं जिसका जन्म ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में हुआ और धीरे-धीरे भारत को उपनिवेश बनाने की दृष्टि से यह प्रणाली और व्यापक तथा प्रभावी होती चली गई। वैसे तो भारत में अनेक विकास कार्यों के लिए ब्रिटिश शासकों की प्रशंसा भी की जाती है और उनकी छोड़ी हुई अनेक विरासतें आजादी के बाद, आजाद भारत में यथावत या कुछ परिवर्तनों के साथ अपना लिया उसमें सबसे प्रमुख यदि कुछ है तो वह है ब्रिटिश काल की नौकरशाही की अवधारणा।

भारत आजाद हुआ, आजादी के बाद बहुत सी चीजें बदली, स्वराज आया लेकिन सुराज आया की नहीं आया इस पर आज भी बहस जारी है। लोक कल्याणकारी राज्य भारत में सुराज की जिम्मेदारी नौकरशाही के कंधों पर है क्योंकि 5 वर्ष के अंतराल पर राजनीतिक कार्यपालिका बदलती रहती है लेकिन स्थाई कार्यपालिका के रूप में नौकरशाही निरंतर चलती रहती है इसलिए सुराज की चिंता करना, सुराज की स्थापना करना, जनता के हितों के साथ न्याय करना इसके कर्तव्यों में शुमार है।

बड़ा सवाल यह है कि स्वराज के आए 74 से अधिक साल बीत गए फिर भी सुराज एक सपना क्यों है? क्या परिस्थितियां हैं कि आज भी कार्यालय की फाइलें, नीतियों, नियमों व निर्णय को तीव्र गति से अंजाम देने में विफल रही हैं, सेवा जनता तक पहुंचाने में लंबा समय ले लेती है? क्या कारण है कि इनके ऊपर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, लेटलतीफी, लटकाने-भटकाने-अटकाने और अपने विषय में अकुशल तथा अपरिपक्व होने के आरोप लगते हैं। क्या कारण है कि नौकरशाही जन आकांक्षाओं को पूरा करने के पैमाने पर द्वितीय श्रेणी में पास होती हुई दिखती है। क्या कारण है कि नौकरशाही आज के समाज की जरूरतों, आज की चुनौतियों के हिसाब से कदमताल करने में विफल दिखाई पड़ती है?

नौकरशाही पर बार-बार सवाल उठते हैं, कभी जनता सवाल उठाती है, कभी राजनेता सवाल उठाते हैं, कभी पत्रकार सवाल उठाता है, कभी नौकरशाही के अंदर से ही नौकरशाही पर सवाल उठते हैं लेकिन इसका माकूल जवाब शायद ही मिलता है?

नौकरशाही 21वीं सदी के भारत की चुनौतियां का सक्षमता से समाधान कर सके, परिवर्तन की वाहक बन सके, जन आकांक्षाओं को पूरा करने में सफल हो पाए इस दृष्टि से उसे तैयार होना होगा इसके लिए उसे स्वयं आगे आना चाहिए लेकिन एक सवाल बार-बार मन में आता है कि जो नौकरशाही इस देश में लोकतंत्र की भाग्य विधाता जैसी दिखती है उसका स्वरूप कैसा हो? यह कौन तय करेगा? तब उत्तर बहुत सरलता से आता है कि यह कर्तव्य तो राजनीतिक कार्यपालिका का है, दूसरा सवाल मन में आता है कि राजनीतिक कार्यपालिका ऐसा करने में विफल क्यों रही? तो इसका उत्तर भी मिलता है उसके पास मजबूत इच्छा शक्ति का अभाव रहा अथवा प्रामाणिक कार्य योजना का अभाव रहा अथवा नौकरशाही में परिवर्तन को लेकर जनता से उसे जनादेश नहीं मिला लेकिन दोष तो राजनीति पर ही आता है।

यह भारतवर्ष और उत्तर प्रदेश का सौभाग्य है कि यहां का राजनीतिक नेतृत्व मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति के हाथ में है, निर्णायक व्यक्ति के हाथ में है, पारदर्शी व्यक्ति के हाथ में है, प्रमाणिक कार्य योजना बनाकर निर्णय को अमलीजामा पहुंचाने की दृष्टि से सक्षम बौद्धिक स्थिति वाले नेतृत्व के हाथ में है, कुछ शुरुआत भी हुई है, कुछ बातें आगे बढ़ी है लेकिन अभी बहुत कुछ करना शेष है… जनता क्या चाहती है? जनता क्या सोचती है? आइए! बिंदुवार इसको परखने की कोशिश करें।

भारत को एक संवेदनशील नौकरशाही की जरूरत है जो मूलभूत आवश्यकताओं से संघर्ष करती बड़ी आबादी की जरूरत को समय पर समझ कर समय बद्ध तरीके से समाधान परोस सके।

भारत को एक सत्यनिष्ठ और ईमानदार नौकरशाह की जरूरत है, एक बड़ी आबादी का देश अपनी विकासशील अवस्था में है विकास के ढेर सारे काम करने हैं, संसाधन सीमित है यदि इसका पारदर्शिता से न्याय प्रियता और निष्पक्षता से जरूरतमंद लोगों तक संसाधन पहुंचाया और इसमें शून्य क्षरण की नीति पर काम किया जाए विकसित भारत खड़ा होने में अधिक समय नहीं लगेगा।

भारत को एक तकनीकप्रिय, कौशल युक्त, विशेषज्ञ नौकरशाही की जरूरत है। विज्ञान की सदी में सुराज तकनीकी से आसानी से लाया जा सकता है इसकी पुष्टि मोदी सरकार की अनेक योजनाओं से हो चुका है। नौकरशाही यदि तकनीकी कुशल होगी उसमें विषय विशेषज्ञता होगी तो निश्चित रूप से वह सही नीतियां बना पाएगी, सही योजनाएं बना पाएगी, सही कार्यक्रम बना पाएंगे,सही पर्यवेक्षण कर पाएंगे और सही लोगों तक लाभ पहुंचा पाएंगे।

नौकरशाही को जनता के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए,उसे जाति,धर्म व सामाजिक विभेद से ऊपर उठकर निष्पक्षता से मानव सेवा के व्रत को अपने जीवन में उतारना होगा इसके लिए इनकी भर्ती, इनके प्रशिक्षण और इनकी तैनाती की दृष्टि से राजनीतिक तंत्र को काम करना होगा।

नौकरशाही को देश की संस्कृति, देश की परंपरा, देश की विरासत, देश की सोच को समझना होगा और उसके अनुरूप चिंतन करते हुए,आचरण करते हुए, व्यवहार करते हुए, संवाद करते हुए समन्वय करते हुए आगे बढ़ना होगा आप जिस जनता के लिए काम कर रहे हैं उसकी सांस्कृतिक,सामाजिक रुचियां और रुझानों की प्राथमिकताओं के हिसाब से चलना होगा।

नौकरशाही की जवाबदेही जनता के प्रति होनी चाहिए उसका मूल्यांकन भी जनता के द्वारा होना चाहिए,वह जिस जिले में काम करता है वहां की जनता उसके बारे में क्या सोचती है जनप्रतिनिधि उसके बारे में क्या सोचते हैं समाज के प्रबुद्ध जन उसके बारे में क्या सोचते हैं यह बात उसके वार्षिक मूल्यांकन में अवश्य आना चाहिए अथवा नौकरशाही वातानुकूलित कक्ष में बैठकर अप्रासंगिक नीतियों,योजनाओं,कार्यक्रमों के सहारे स्वयं तो फलेगी- फूलेगी परन्तु जनता की स्थिति में बदलाव आने में अवश्य सफलता नहीं मिलेगी।
नौकरशाही को जनता के सेवक के रूप में अपनी स्थिति को और मजबूत बनानी होगी, उसके अंदर जो विशिष्ट वर्ग का भाव है,स्वामी का भाव है, संभ्रांत का भाव है उसके ऊपर उठना होगा उसे अपने आर्थिक साम्राज्य निर्माण के मनोभाव पर भी अंकुश लगाना होगा।

आज की चुनौती के हिसाब से राजनीतिक,कार्यपालिका को बेहतर नौकरशाही के निर्माण की दिशा में क्या करना चाहिए:-
सिविल सेवकों के प्रशिक्षण की प्रक्रिया को उपर्युक्त चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए पुनर्गठित करने की जरूरत है,जिसमें संवेदनशील,सामाजिक सरोकारों को समझने वाली,जाति धर्म जैसे संकीर्णताओं से ऊपर उठकर सोचने वाली,मानव मात्र की सेवा के प्रति प्रतिबद्ध, स्वामी की जगह सेवक के भाव वाली,विशिष्ट वर्ग की जगह आमजन के भाव से ओत प्रोत नौकरशाही बन सके।
नौकरशाही प्रशिक्षण के उपरांत जब सेवा में आती है और जो लोग वर्तमान में सेवारत हैं उन्हें उनके रुचि के विषय के हिसाब से विशेषज्ञ बनाना चाहिए और उनकी तैनाती में उनकी विशेषज्ञता का पूरा ध्यान रखा जाए और यथासंभव तैनाती की अवधि भी निर्धारित की जाए।
नौकरशाही के कार्यों का निष्पक्ष और निरंतर मूल्यांकन होता रहे इसके लिए स्कोरकार्ड मेथड जैसी वास्तुनिष्ठ मूल्यांकन प्रणाली का विकास किया जाए जो डिजिटल ऐप के रूप में हो जिसमें उनकी प्रशासनिक कुशलता,उनकी संवेदनशीलता, उनकी निष्पक्षता, आपातकाल में उनके नेतृत्व की क्षमता जनता और जनप्रतिनिधियों से समन्वय की क्षमता भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक परंपराओं और विरासत की समझ इत्यादि के आधार पर जनता, जन प्रतिनिधियों और प्रबुद्ध जनों से भी मूल्यांकन कराया जाए और इसके आधार पर ही उनका कैरियर विकास सुनिश्चित हो।
नौकरशाही के प्रशिक्षण, तैनाती, पदोन्नति इत्यादि के लिए एक बोर्ड बनाया जाए जिसमें विभिन्न कैडर से लोगों का प्रतिनिधित्व हो, जनता का भी प्रतिनिधि उसमें हो और इसका नेतृत्व एक राजनीतिक कार्यपालिका के हाथ में जो वस्तुनिष्ठ होकर निष्पक्षता से सर्वसम्मति के आधार पर निर्णय कर सके।
नौकरशाही की सक्षमता का प्रत्येक 5 वर्ष में मूल्यांकन होता रहे और उन्हें तत्काल की चुनौतियों के हिसाब से पुनः प्रशिक्षित किया जाता है और उसके बाद भी यदि अपेक्षित परिणाम देने में विफल होते हैं तो बिना किसी विलंब के सेवा से मुक्त करने का प्रावधान भी किया जाए।

महाशक्ति भारत, विकसित भारत, जगतगुरु भारत जैसी शब्दावली आज जन-जन कु जुबान पर है। यह उद्देश्य बड़ा है,कठिन है लेकिन प्राप्य है, दुर्लभ नहीं है, जरूरत है एक जनोन्मुखी नौकरशाही की, समाधान कारी नौकरशाही की, प्रभावी नौकरशाही की, संवेदनशील नौकरशाही की, निष्पक्ष नौकरशाही की, न्यायप्रिय नौकरशाही की, सेवाभावी नौकरशाही की जिसे प्राप्त करने का दायित्व राजनीतिक नेतृत्व पर है, सुखद है कि उस नेतृत्व को आज जनता का विश्वास मिला हुआ है, उसकी कुशलता पर भी जनता को भरोसा है, यह राजनीति को सोचना है कि उसे यदि बड़े उद्देश्य प्राप्त करने हैं तो उसका साधन उत्कृष्ट श्रेणी का होना चाहिए, कोई भी सेनापति दोयम दर्जे के घोड़े से बड़ा युद्ध नहीं जीत सकता है।

लेखक – चंद्र भूषण पांडेय
9415136527

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